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भामती - पद्मश्री उषा किरण खान

Description:

साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित ‘भामती’ यह उपन्यास मिथिला के मीमांसक, अद्वैत दर्शन के टीकाकार परम विद्वान पं. वाचस्पति मिश्र के जीवन पर आधारित प्रेम कथा है। Novel ‘Bhamati’, felicitated by / awarded by India’s National Academy of Letters is a love story based on life of critique of Adwait Darshan and Scholar from ‘maithili’ Pandit Vachaspati Mishra.



लेखकाचे मनोगत प्राचीन इतिहास एव संस्कृति की स्नातक कक्षा में धर्म और दर्शन एक पत्र था। विज्ञान की ओर से आई मुझ जैसी छात्रा के लिए यह विषय रुचिकर नहीं था। परंतु धर्म-दर्शन की कक्षा लेने वाले प्रोफेसर डॉ. उपेन्द्र ठाकुर का ज्ञान और उनका प्रस्तुतिकरण इतना हृदयग्राही था कि अपने हिसाब से नीरस विषय में मुझे रस आने लगा। मुझे ही क्यों, कक्षा की सभी छात्र-छात्राओं को रुचिकर लगने लगा। डॉ. ठाकुर ने वाचस्पति मिश्र का जिक्र आने पर अवांतर जाकर उनके चौगिर्द बने मायाजाल रूपी दंतकथाओं का वर्णन किया। भामती जैसी नारी तथा वाचस्पति जैसे व्यक्ति की चर्चा करते न थकते। मिथिला में भामती सीता के बाद सबसे परिचित तथा लोकप्रिय पात्र है। उसके संबंध में जो दंतकथा प्रचलित है वह यह है- वाचस्पति जब भामती को ब्याह लाए तब तत्काल ही तत्कालीन शंकराचार्य आए और उन्हें ‘ब्रह्मसूत्र’, जो मंडन का लिखा था, का शांकर भाष्य लाकर आग्रह किया कि इसकी टीकाकर दें ताकि अधिक लोगों तक यह पहुंचे। वाचस्पति ने आग्रह स्वीकार कर लिया। स्वीकार तो कर लिया परंतु टीका करने में तथा अपनी ओर से स्थापनाएं देने में ऐसे डूब गए कि दीन-दुनिया ही बिसार दी। इधर भामती उनकी देखभाल में लीन हो गई। दीऐ की लौ कभी मद्धिम न होने दी। कथा है कि वाचस्पति अठारह वर्षों तक टीका करते रहे। जब पुस्तक समाप्त हुई तब उन्होंने देखा कि एक अधेड़ स्त्री दीप प्रज्ज्वलित कर रही है। पूछा-आप कौन हैं? भामती ने कहा-मैं आपकी पत्नी भामती हूं। पंडितजी को स्मरण हो आया-उन्होंने विवाह-द्विरागमन कराके भामती के साथ गृह प्रवेश किया था। उन्होंने देखा भामती की आंखों में आंसू हैं। पूछा-आप रो क्यों रही हैं? भामती ने कहा कि आपकी कुल परंपरा अब मुझसे नहीं चलेगी। मैं गत-आयु हो गई हूं। पंडितजी ने कहा संतान किंवा पुत्र से कुलपरंपरा अधिक दिनों तक नहीं चलती। कभी न कभी खंडित हो जाती है। मैं आपको यह पुस्तक समर्पित करता हूं जो अक्षुण्ण रहेगी। उन्होंने पुस्तक का नाम भी ‘भामती-टीका’ रख दिया। ऐसा किसी ने नहीं किया है। नागार्जुन तथा डॉ. उपेन्द्र ठाकुर को उन-दम्पत्ति के इस घटना क्रम के संबंध में चर्चा करते विह्वल होते देखा है हमने। मेरे मन में कई प्रश्न थे इतिहास की छात्रा तथा शिक्षिका होने के क्रम में। यह था कि मात्र डेढ़ सौ वर्ष पूर्व मिथिला की विदुषी नारी पति तथा शंकर जैसे विद्वान के शास्त्रार्थ की निर्णायक थीं, डेढ़ सौ वर्षों में न तो कोई बाह्य आक्रमण हुआ न कुछ! तो शिक्षा का अनायास लोप क्यों हो गया? इसलिए भामती के बहाने मुझे दसवीं सदी के कालखंड का मिथिला और उसकी सामाजिक, ऐतिहासिक तथा राजनैतिक परिस्थिति की पड़ताल करनी पडी। उपन्यास मैंने भामती और वाचस्पति के अमर अविस्मरणीय प्रेम के धागों से बुना है जिसमें संपूर्ण मिथिला का तत्कालीन समाज है, उसके गुण-अवगुण हैं-मिथिला क्यों शिथिला होती गई इसकी पीड़ा है। मैथिली के पाठक वर्ग ने उपन्यास को बेहद सराहा है, अब मैं व्यापक पाठक वर्ग के समक्ष इसे प्रस्तुत करने जा रही हूं। आशा व्यक्त करती हूं-कि आपको पसंद आए। उषा किरण खान


Format: Adaptive

Publisher: सृजन ड्रीम्स प्रा. लि