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बंद खिड़कियाँ - रेखा विनीत

Description:

‘बंद खिड़कियाँ’ कहानी है रिश्तों के ताने-बानों की. वो रिश्ते, जिन्हें साथ लेकर हम इस दुनिया में आते हैं ; वो रिश्ते जो हम खुद हमारे लिये चुनते हैं. और जिन्दगी की भाग-दौड़ में कुछ रिश्ते पीछे छुट जाते हैं |



प्रस्तावना मैं, रेखा विनीत, लेखन जगत में अपना प्रथम प्रयास, ‘बंद खिड़कियाँ’ लेकर आपके समक्ष आई हूँ.  कुछ रिश्ते टूट जाते हैं कुछ हम खुद तोड़ देते हैं. कुछ रिश्ते जो जुड़ नहीं पाते और कुछ जुड़े हुए रिश्ते जो सिसकते रहते हैं. फिर भी, यह रिश्ते ही हमें हमारे वजूद का एहसास करवाते हैं और हर रिश्ता हमें कही ना कहीं पूर्ण करता हैं. यहाँ मैं कुछ दिनों पहले घटित एक घटना का ज़िक्र करना चाहूँगी. मैं और मेरे पति विनीत, बाहर जाने के लिये अपने गेराज में से कार निकाल रहे थे. तभी बंद खिड़की के पास बैठी एक चिड़िया की तरफ हमारा ध्यान गया जो बार-बार उड़ने की कोशिश कर रही थी लेकिन कांच से टकराकर फिर वही बैठ जाती थी. उसकी तड़प मुझसे देखी न गयी और मैंने विनीतसे खिड़की खोलने के लिये कहा. “अगर उसे उड़ना ही है तो सामने गेराज का इतना बड़ा दरवाजा खुला पड़ा है वो वहाँ से उड़ सकती है.” विनीत ने कहा. फिर भी दोबारा कहने पर विनीत ने खिड़की खोल दी और चिड़िया फुर्र से उड़ गयी. विनीत को चिड़िया की मंद बुदधि पर आश्चर्य हुआ और मानव के विकसित मस्तिष्क पर शायद नाज़ हुआ. लेकिन मैं सोचती हूँ क्या हम सभी उस चिड़िया की भांति किसी एक ही रिश्ते की डोर, किसी एक ही लक्ष्य को लिये नहीं चलते रहते? क्या हम एक रिश्ते से चोट खाकर दूसरे रिश्तों को अपने ज़ख्मों पर मरहम लगाने का अवसर देते हैं? अपने एक लक्ष्य को पूरा करने में इतना खो जाते हैं कि इस बात का एहसास ही नहीं कर पाते हमने क्या खो दिया? ‘बंद खिड़कियाँ’ दस्तक है ऐसे ही बंद दरवाजों पर जिन पर हमने भीतर से कड़ी लगा रखी हैं. लेकिन यह दरवाजे खुलना चाहते हैं, सांस लेना चाहते हैं, जीना चाहते हैं. मेरे इस प्रयास से अगर कहीं एक झरोखा भी खुल पाया तो मेरी लेखनी धन्य हो जाएगी.     जिंदा तो सभी हैं मौत के ना आने तक तू जी ले जरा जिंदगी साँसों के रुक जाने तक


Format: Adaptive

Publisher: सृजन ड्रीम्स प्रा. लि